रायपुर : मुख्यमंत्री ने उद्यानिकी महाविद्यालय जगदलपुर में क्रांतिकारी डेबरीधुर की प्रतिमा का किया अनावरण

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने आज जिला मुख्यालय जगदलपुर के धरमपुरा स्थित क्रांतिकारी डेबरीधुर उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र परिसर में भूमकाल आंदोलन के नायक वीर डेबरीधुर जी की प्रतिमा का और उनके जीवन परिचय पर आधारित शिलालेख का अनावरण किया। इस मौके पर उन्होंने भूमकाल आंदोलन के क्रांतिकारी डेबरीधुर के योगदान का पुण्य स्मरण कर उन्हें नमन किया। उन्होंने कहा कि बस्तर के भूमकाल विद्रोह में आदिवासी जननायक वीर गुंडाधुर के साथ क्रांतिकारी डेबरीधुर जैसे कई अन्य नायकों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है। बस्तर के आदिवासी नायकों का योगदान अविस्मरणीय और अतुलनीय है। श्री साय ने कहा कि बस्तर क्रांतिकारियों की धरती है। यहां के आदिवासी जननायकों ने अपनी वीरता और साहस से दमनकारी शक्तियों का पूरजोर मुकाबला किया। वीर गेंदसिंह, हिड़मा मांझी, नागुल दोरला, वीर झाड़ा सिरहा जैसे अनेकों बस्तर के वीरों ने अपनी माटी की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

इस मौके पर विधायक चित्रकोट श्री विनायक गोयल, पूर्व सांसद श्री दिनेश कश्यप, पूर्व विधायक श्री संतोष बाफना, श्री बैदूराम कश्यप, श्री सुभाऊ कश्यप सहित बस्तर कमिश्नर श्री श्याम धावड़े, आईजी श्री सुंदरराज पी., महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आर. एस. कुरील, कलेक्टर श्री विजय दयाराम के भी उपस्थित थे।गौरतलब है कि डेबरीधुर बस्तर के महान भूमकाल विद्रोह 1910 के महानायक गुण्डाधूर के निकट सहयोगी क्रांतिकारी और बलिदानी के रूप में जाने जाते हैं। बस्तर के ग्राम एलेंगनार में जन्में डेबरीधुर धुर्वा जनजाति के आदिवासी युवक थे। उनका वास्तविक नाम बोरगाधुर था, लेकिन तीर धनुष, तलवार, कुल्हाड़ी आदि हथियार चलाने सहित अन्य सभी कार्य बायें हाथ से करने के कारण वे डेबरीधुर कहलाए। बस्तर अंचल में डेबरी का अर्थ बायाँ होता है।डेबरीधुर ने अपने वीर साथी क्रांतिकारी नायकों के साथ अंग्रेजों के शोषण, अनाचार, दमन और अत्याचार से बस्तर को मुक्त करवाने के लिए गाँव-गाँव में बैठक के माध्यम से लोगों को जागरूक व संगठित कर संघर्ष के लिए तैयार करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने गुण्डाधुर के साथ कदम से कदम मिलाकर लड़ाई का नेतृत्व किया।भूमकाल विद्रोह विश्वासघातियों के कारण अंग्रेजों के पक्ष में जाने लगा। डेबरीधुर गिरफ्तार कर लिए गए। सम्भवतः दिनांक 29 मार्च 1910 को उन्हें जगदलपुर स्थित गोलबाजार के इमली के वृक्ष में फांसी दे दी गई। उस समय उनकी उम्र महज 22 वर्ष की थी। भूमकाल के इस वीर महायोद्धा के अमूल्य बलिदान को बस्तर कभी विस्मृत नहीं कर सकेगा। भूमकाल के स्मृति दिवस 10 फरवरी को प्रतिवर्ष आदिवासी समाज द्वारा वीर गुण्डाधुर और डेबरीधुर सहित आंदोलन के सभी नायकों के शहादत को यादकर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।डेबरीधुर की वीरता और साहस ने उन्हें आदिवासी समाज में एक अद्वितीय स्थान प्रदान किया है। उनका संघर्ष अपनी मातृभूमि के स्वतंत्रता के लिए हुआ, और वे उस संघर्ष में सर्वस्व न्यौछावर कर बैठे। उन्होंने अपने जीवन में वीरता का परिचय किया और अपने प्राणों की आहुति दी ताकि उनके साथी आदिवासी भाइयों को अपनी आजादी मिले।इस समारोह में शामिल हुए विभागीय अधिकारियों ने भी डेबरीधुर के बलिदान को श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके योगदान की महत्वपूर्णता को बताया। मुख्यमंत्री ने डेबरीधुर के परिवार के सदस्यों को समर्थन दिया और उनके साहसपूर्ण योगदान के लिए उन्हें आभार व्यक्त किया।

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